Vidur Niti Shlokas

Vidur Niti Shlokas निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते । अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम् ॥ भावार्थ : सद्गुण, शुभ कर्म, भगवान् के प्रति श्रद्धा और विश्वास, यज्ञ, दान, जनकल्याण आदि, ये…

Continue Reading Vidur Niti Shlokas

Sanskrit Subhashitani

Sanskrit Subhashitani अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च । पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् ॥ भावार्थ : यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व…

Continue Reading Sanskrit Subhashitani

Valmiki Ramayana Shlokas

Valmiki Ramayana धर्म-धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् । धर्मण लभते सर्वं धर्मप्रसारमिदं जगत् ॥ भावार्थ : धर्म से ही धन, सुख तथा सब कुछ प्राप्त होता है । इस संसार में…

Continue Reading Valmiki Ramayana Shlokas

Bhagavad Geeta Shlokas

Bhagavad Geeta Shlokas यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥ भावार्थ : जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न…

Continue Reading Bhagavad Geeta Shlokas

Chanakya Shlokas

chanakya shlokas कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा ॥ भावार्थ : न कोई किसी का मित्र है और न ही शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और…

Continue Reading Chanakya Shlokas

Sanskrit Shlokas

गच्छन् पिपिलिको याति योजनानां शतान्यपि । अगच्छन् वैनतेयः पदमेकं न गच्छति ॥ भावार्थ : लगातार चल रही चींटी सैकड़ों योजनों की दूरी तय कर लेती है, परंतु न चल रहा…

Continue Reading Sanskrit Shlokas